प्रदीप सिंह आखिर अन्ना हजारे जीत ही गए। मगर अन्ना को ये जीत बड़ी मुश्किल से मिली है। राजनेताओं के ईगो ने जो बाधा खड़ी की थी उससे पार पाना अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी के वश की ही बात है। अन्ना अपनी बात पर अड़े रहे और 12 दिन बीत जाने के बाद भी अपना अनशन समाप्त नहीं किया। एक सच्चे गांधीवादी के सामने सरकार को झुकना ही पड़ा। जनभावनाओं का ध्यान में रखकर सरकार को महत्वपूर्ण फैसला लेना ही पड़ा। आखिर कब तक सरकार सच्चाई से मुंह मोड़ सकती थी। कब तक वो जनआंदोलन को नजरअंदाज करती। एक न एक दिन उसे तो जनता के हित में फैसला लेना ही था, सो भले ही उसने 12 दिन की देरी कर दी मगर एक सही फैसला लिया है। इस फैसले की तारीफ की जानी चाहिए। जिस तरह से विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने जनलोकपाल बिल को अपना समर्थन दिया है उसकी भी तारीफ की जानी चाहिए। कांग्रेस ने एक बार फिर साबित किया है कि लाख राजनीतिक मजबूरियां हो, लाख राजनीतिक स्वार्थ और ईगो हो मगर जनता का हित सर्वोपरि है। जनता को नाराज करके ज्यादा दिन तक शासन नहीं किया जा सकता है। ऐसे में समझदार कांग्रेस मुसीबत क्यों मोल लेती। उसने अन्ना के सामने हार मान ली और आनन-फानन में संसद की बैठक बुलाकर लोकपाल बिल का प्रस्ताव पास करवा दिया। अन्ना ने इसे आधी जीत बताया है। जब ये बिल संसद के दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल कर लेगा, तब जाकर जनलोकपाल का आंदोलन का संघर्ष समाप्त होगा। कुछ सालों तक कोई ये मानने को तैयार नहीं था कि भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा और सरकार हिल जाएगी। मगर धन्यवाद अन्ना हजारे का जो उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। ऐसा मुद्दा जिसने सरकार की नींद हराम कर दी। जनता सड़कों पर उतरी उसका नतीजा भी उसे हासिल हुआ। एक अच्छे बिल की उम्मीद अब वो कर सकती है। लेकिन एक बात जो सबसे अहम है वो ये कि सिर्फ कानून बना लेने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। जरूरी है सभी अपने अंदर वो नैतिक बल भी विकसित करे जो भ्रष्टाचार का विरोध करती है। तभी सही मायने में भ्रष्टाचार की जंग में भारत की जनता की जीत होगी।
जनलोकपाल आंदोलन को दबाने की साजिश!
अब अरुणा रॉय भी अपना लोकपाल बिल लेकर आ गई हैं। यानि अब देश के सामने तीन लोकपाल के मसौदे आ गए हैं। भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए जिस व्यवस्था की मांग की जा रही थी, उसके लिए तीन विकल्प मौजूद हैं। अब न तो इससे सरकार को किसी तरह की परेशानी होनी चाहिए और न ही जनता को। बल्कि यहां ये भी कहा जा सकता है कि एनजीओ चलाने वालों को भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। तीन-तीन विकल्प मौजूद हैं जाहिर है लोकपाल बेहतर होगा। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार सशक्त लोकपाल का बिल संसद में पास करवाने को लेकर वाकई गंभीर है। इसका जवाब यदि आपको चाहिए तो फिर जवाब यही है कि सरकार कतई गंभीर नहीं है। आपको बता दें कि लोकपाल बिल को सबसे पहले वर्ष 1968 में लोकसभा के पटल पर रखा गया था और इसे रखा था तात्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण ने। मगर अफसोस की बात ये है कि तब से लेकर अभी तक ये बिल संसद से पारित नहीं हो पाया। अजी होगा भी कैसे बेचारे सांसदों और नेताओं पर शिकंजा जो कस जाएगा। एक -एक करके उनके भ्रष्टाचार का पर्दाफाश जो होने लगेगा। इसके साथ सबसे बड़ी बात कि वो इसके अपने अपराध के लिए दंडित भी होने लगेंगे। ऐसे में कौन इस बिल को पास करके मुसीबत मोल लेना चाहेगा। लाखों खर्च करके जो नेता संसद में पहुंचता है वो किस मंशा के साथ संसद में जाता है ये पिछले 64 साल में जाहिर हो गया है। ऐसा कौन होगा जो खुद ही अपना गला फांसी के फंदे में फंसा लेगा, यही वजह है कि अभी भी इस बिल को रोकने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। जनता को बेवकूफ बनाने के लिए अप्रभावी लोकपाल बिल संसद में पारित करने पर सरकार आमादा है। सरकारी लोकपाल बिल को पारित करके सरकार जनता को पूरी तरह से बेवकूफ बनाने की फिराक में है। तभी तो वो न ही अन्ना हजारे की बात सुन रही है और न ही जनलोकपाल बिल की खूबियों पर कोई चर्चा करना चाहती है। जनलोकपाल बिल का जो मसौदा है वाकई बेहतरीन मसौदा है और यदि ये लागू हो गया तो इसमें कोई राय नहीं कि भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगा। मगर सवाल वही आकर खड़ा हो जाता है कि आखिर ये बिल कैसे और कब कानून में तब्दील होगा क्योंकि इसके साथ में कई सारी बाधाएं खड़ी हैं। सारे के सारे नेता इस बिल के विरोध में है। जनलोकपाल ने नेताओं के बीच आतंक पैदा कर दिया है। सरकार ऐसा कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहती जिसमें कि वो इस बिल को लेकर हो रहे आंदोलन को दबा सके। चाहे अन्ना हजारे की गिरफ्तारी हो या फिर बाबा रामदेव पर दमनात्मक कार्रवाई, ये सब यही दर्शाता है कि सरकार नहीं चाहती कि जनता लोकपाल बिल के समर्थन में आवाज उठाए। सरकार अपने तरीके और सहूलियत से लोकपाल बिल को लाना चाहती है। वो ये सुनिश्चित करना चाहती है कि जो भी सरकारी लोकपाल आएगा उससे नेताओं को किसी भी प्रकार का खतरा न हो। आखिर सरकार को नेता ही तो चला रहे हैं ऐसे में सारी मशीनरी उनके हितों का ध्यान तो रखेगी ही। कार्यपालिका और विधायिका का गठजोड़ जनलोकपाल के आड़े आ रहा है। जनलोकपाल के आंदोलन को दबाने का भरपूर प्रयास हो रहा है। इसका असर अब न्यूज चैनलों और अखबारों पर भी दिख रहा है। मगर उनके साथ दिक्कत ये है कि वो भी जनता के आगे सरकार की नहीं सुन पा रहे हैं। सरकार को इतनी पावर मिली है कि बेचारी वो ये बार-बार भूल जाती है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है और संविधान भारतीय जनता को ये अहसास करवाता है कि भारत की जनता काफी शक्तिशाली है। वो जनार्दन है। मगर सरकार सैद्धांतिक तौर पर तो मानती है कि जनता जनार्दन है मगर व्यावहारिक तौर पर वो ये मानने को कतई तैयार नहीं दिखती। कहां सरकार को लोकतंत्र की कड़ी को मजबूत करना चाहिए तो वो गांधीवादी तरीके से हो रहे जनआंदोलन को दबाने में अपना समय बर्बाद कर रही है। आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने क्या-क्या नहीं किए, हर वो हथकंडा अपनाया जो उसे शोभा नहीं देता है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। बदला लेने की कार्रवाई भी हुई । हर वो बात हुई जिसे सुनकर सरकार के नुमाइंदों पर शर्म आती है। मगर क्या करें ये सारे नुमाइंदे पांच साल के लिए चुन के संसद में गए हैं ऐसे में पांच साल के पहले आप उन्हें कुछ कह नहीं सकते। चलिए कोई बात नहीं। सरकारी लोग हैं उन्हें कुछ कहना भी नहीं चाहिए वरना उनके ईगो को ठेस लग जाती है।मगर सरकार में बैठे लोगों की हरकतें कुछ ऐसी है जिन पर चर्चा करना जरूरी है। अब देखिए एक और नया लोकपाल बिल आ गया। इससे पहले आपको बता दें कि जरा आप कुछ टीवी चैनलों के जनलोकपाल आंदोलन पर भी गौर कीजिएगा, आपको कुछ फर्क जरूर नजर आएगा। सरकार की सख्ती का असर लगता है इन चैनलों पर भी हुआ है जो पहले सिर्फ अन्ना ही अन्ना करते-चिल्लाते नजर आते थे, अब वे अन्ना के साथ-साथ सरकार के साथ भी नजर आते हैं। आंदोलन में जमा हो रही भीड़ पर सरकार के मंत्रियों की राय थी कि ये पीपली लाइव का दूसरा रूप है। यही वजह है कि सरकार ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर भी दबाव बनाने की कोशिश जरूर की है। तभी अचानक कई न्यूज चैनलों और पत्रकारों के सुर बदल गए। अब एक और नए लोकपाल बिल का मसौदा सामने आया है और इसे पेश किया है अरुणा रॉय ने। वैसे अरुणा के बारे में बता दें कि ये सामाजिक कार्यकर्ता है और सूचना के अधिकार कानून को लागू करवाने में अपनी महती भूमिका निभाई है। मगर इसके साथ ही आपको ये भी बता देते हैं कि मैडम कांग्रेस के काफी करीब हैं और फिलहाल एनएसी यानि नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की सदस्य हैं। थोड़ा इस बात को समझने का प्रयास करेंगे। एक तरफ सरकार जनलोकपाल बिल आंदोलन को दबाना चाहती है तो दूसरी ओर एक और एनजीओ वाला दूसरा लोकपाल का मसौदा लेकर सामने आ गया। बड़ी बात कि वो जनलोकपाल का जमकर विरोध कर रहा है। वो दावा कर रहा है कि उसका लोकपाल बिल सबसे बढ़िया है। उसका ये भी दावा है कि जब अन्ना टीम की बात लोकपाल के मुद्दे पर सुनी जा सकती है तो फिर उसकी बात भी सुनी जानी चाहिए और उसके ड्राफ्ट को भी देखा और परखा जाना चाहिए। चलिए यहां तक तो ठीक है मगर शक इसलिए पैदा होता है कि एक तरफ अन्ना और सरकार के बीच में ठनी हुई है और सरकार किसी भी कीमत पर अन्ना के सामने झुकने को तैयार नहीं है। वो हर हालत में अन्ना की लहर को खत्म करना चाहती है। वो किसी भी तरह से जनलोकपाल के आंदोलन को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है ऐसे में क्या ऐसी संभावना नहीं बनती कि अरुणा कांग्रेस के कहने पर जनलोकपाल के आंदोलन को भटकाने के लिए नए लोकपाल का पासा फेंक रही हैं। कहीं ये अन्ना के आंदोलन को खत्म करने की साजिश तो नहीं। कुछ भी हो सकता है। जिस तरह से अन्ना के अनशन ने सरकार की नींद उड़ाई है उसे देखते हुए सरकार कुछ भी कर सकती है। भई राजनीति बेहद बुरी चीज है। देख लीजिए अन्ना की टीम में कितने अच्छे-अच्छे और ईमानदार लोग जुड़े हैं मगर फिर भी उन्हें एक अच्छा बिल संसद से पारित करवाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। इस पूरी लड़ाई में आम आदमी की क्या बिसात है। कैसे वो अपने राजनेताओं से उम्मीद करेगा कि वो उनके दुख दर्द को समझेंगे। ये सोचने वाली बात है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि लोकपाल को लेकर कई महीनों से हंगामा खड़ा है लेकिन अब जाकर अरुणा की नींद कैसे खुल गई। उन्हें अचानक से लोकपाल की कैसे याद आ गई। सरकार और अरुषा द्वारा बार-बार संसद की स्टैंडिंग कमेटी का हवाला दिया जा रहा है। अब तक न जाने कितनी बार लोकपाल बिल स्टैंडिंग कमेटी के पास गया लेकिन अभी तक पास नहीं हो पाया। एक बार फिर स्टैंडिंग कमेटी का हवाला देकर सरकार इस बिल को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है। जनलोकपाल के मुद्दे पर ये कहीं से नहीं लगता कि ये सरकार जनता के साथ है। कहीं से ये महसूस नहीं होता कि ये सरकार जनता के हितों के लिए भी सोचती है। अब जनता को तय करना होगा कि आखिर वो किसको वोट देती है। किसे वो अपना जनप्रतिनिधि चुनती है। जब उसके पास अपने लिए बेहतर सांसद चुनने का अधिकार है तो आखिर वो सेवक की जगह राजा को कैसे अपना प्रतिनिधि चुन लेती है। जनलोकपाल आंदोलन के बहाने जनता को आत्ममंथन करना चाहिए और तय करना चाहिए कि अब तक वो जो गलती करती आ रही है आगे इसे वो नहीं दोहराएगी। नहीं तो उसे ऐसी ही सरकार और जनप्रतिनिधियों का सामना करना होगा जो सिर्फ और सिर्फ अपना सोचते हैं।
(भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा विरोधी)
संसद का अपमान जनता का अपमान है
यूपीए सरकार के मंत्री कब अपने ईगो के घोड़े से नीचे उतरेंगे, समझ में नहीं आता। इस बेवकूफी को अब और क्या नाम देंगे? देश की जनता सड़कों पर उतर आई है और यूपीए के मत्रियों को होश नहीं आ रहा। 17 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा में अन्ना हजारे के अनशन और आंदोलन एवं उनके खिलाफ सरकार की कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बयान दिया। मगर इस बयान को जहां विपक्ष ने सिरे से खारिज कर दिया तो वहीं जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ। शाम होते-होते आंदोलन और तेज हो गया। आंदोलन की ताकत दिखी इंडिया गेट से जंतर-मंतर तक कैंडल मार्च में। बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के इतनी बड़ी भीड़ बहुत कुछ कहती है। ये भीड़ साफ कहती है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर कर रही है। जनता जाग उठी है, वो भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त लड़ाई लड़ने के मूड में आ गई है। अब इस लड़ाई को कोई नहीं रोक सकता। जब तक देश से भ्रष्टाचार नहीं भागेगा तब तक जनता अपना आंदोलन जारी रखेगी। जनता को मिल गया है उसका आधुनिक गांधी। ऐसे में गांधी रुपी अन्ना के नेतृत्व में उसका आंदोलन और मजबूत हो गया है। मगर दुख की बात ये है कि सरकार पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब कर रही है। जिस तरह से जनता सड़कों पर उतरी है उससे मिस्त्र की याद ताजा हो जाती है। मगर मिस्त्र और भारत के आंदोलन में फर्क है। मिस्त्र में सत्ता परिवर्तन के लिए विद्रोह हो रहा था तो भारत में भष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह चल रहा है। भारतीय नागरिक देश के विकास के लिए बेहद चितिंत हैं। यही वजह है कि शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार में शामिल कई ऐसे नेता है जो अपने ईगो में देश को बर्बाद कर रहे हैं। संसद में हुए बहस के दौरान जिस तरीके से कई नेताओं ने संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देकर खुद को पावरफुल साबित करने की कोशिश की, उसे देखकर जनता को तकलीफ होती है। अभी तक सबको पता था कि संसद या भारतीय सरकार जनता की ,जनता के लिए, और जनता के द्वारा के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि संसद में भेजे गए जनता के प्रतिनिधि जनता से बड़े कैसे हो सकते हैं। याद रखिए सड़कों पर कोई व्यक्ति विशेष नहीं उतरा है। ये जनता उतर चुकी है। सरकार व्यक्ति विशेष के नाम पर जनता को नहीं पहचानने की भूल कर रही है। देश के लिए आजादी जनता ने हासिल की है। संसद के रूप में जनता ने लोकतंत्र का मंदिर बनाया है। उसे पूरा हक है ये जानने का कि उसके मंदिर में क्या हो रहा है। मगर जब वो जानने की कोशिश करती है तो उसे उसकी कोई बात नहीं सुनी जाती है। लोकतंत्र के मंदिर में जिस तरीके से स्वार्थ की राजनीति होती है और जनता के हितों को उपेक्षित किया जाता है तब जनता को बेहद तकलीफ होती है। उसे पता चलता है कि उसके द्वारा भेजा गया प्रतिनिधि तो भ्रष्टाचार में डूबा है। उसे जिस काम के लिए संसद में भेजा गया वो काम तो वो कर ही नहीं रहा है। यानि वो अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन नहीं कर रहा है। वो खुद को राजा समझने लगा है और उसकी नजर में जनता प्रजा हो गई है। वो ये समझने लगा है कि जनता का काम है कि हर पांच साल पर चुनाव के वक्त चुपचाप वोट देना। नेता अब ये उम्मीद करते हैं कि जनता उनके इशारों पर नाचे। जनलोकपाल बिल का उदय नेताओं और प्रतिनिधियों के निकम्मेपन और गैरजिम्मेदाराना रवैये का नतीजा है। नेताओं ने लुटेरों के तौर पर अपनी जो इमेज बनाई है, आखिर कब तक जनता ऐसे इमेज पर भरोसा करती रहेगी। ऐसे भ्रष्टाचारियों को बर्दाश्त करेगी। अन्ना का आंदोलन ऐसे नेताओं के लिए एक सबक है जो भ्रष्टाचार में डूब हैं। विधायिका आत्ममंथन करे कि उसके अंदर कितने भ्रष्टाचारी और अपराधी किस्म के लोग आ घुसे हैं। ऐसे भ्रष्टाचारियों की वजह से संसद का अपमान हो रहा है और संसद के अपमान का मतलब है जनता का अपमान। लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि जनता का सेवक होता है न कि उसका मालिक या तानाशाह। यूपीए सरकार के मंत्री जनता का मालिक और तानाशाह बनने की कोशिश में है। नतीजा सामने है जनता उनको अपनी ताकत दिखा रही है। वे ये न कहें कि जनता का डेमोक्रेसी में कोई भरोसा नहीं रह गया है। यदि वे ये सोचते हैं तो बेहद गलत सोचते हैं। भारत की जनता लोकतंत्र में काफी आस्था रखती है। वो लोकतंत्र के बिना जी नहीं सकती। मगर जो शख्स और सिस्टम लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करेगा तो फिर ये जनता उसके खिलाफ सड़कों पर उतरेगी ही। मान लीजिए सरकार और चुने हुए प्रतिनिधियों ने कोई देश विरोधी प्रस्ताव पास कर दिया तो क्या जनता उसका विरोध नहीं करेगी? एकदम विरोध करेगी, पुरजोर विरोध करेगी। जनता हर वो काम करेगी जो देशहित में होगा। सरकार के मंत्री और सांसद जान लें कि भारत की जनता बहुत बड़ी देशभक्त है। वो अने अधिकारों के बारे में जानती है। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन इस देश के नागरिकों को संवैधानिक अधिकार है, सरकार इस अधिकार का हनन नहीं कर सकती। अन्ना को गिरफ्तार करके सरकार ने नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन किया है, इसके लिए उससे अफसोस जताना चाहिए। सरकार को ये कोशिश करनी चाहिए कि किसी भी सूरत में मौलिक अधिकारों का हनन न हो। रही बात जनलोकपाल बिल की, तो सरकार को ये तय करना चाहिए कि कैसे एक सशक्त लोकपाल बिल संसद में पास होगा। जनता के मन में शंका है सरकार को उसे दूर करना चाहिए। शंका ये है कि मान लीजिए A किसी भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है तो ये कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो अपने खिलाफ सशक्त लोकपाल बिल को कानून बनने देगा। क्या ऐसा होता है कि कोई अपने आप को ही जेल भेजने का इंतजाम कर ले। कोई चाहेगा कि वो ऐसे बिल का समर्थन करे जो उसकी काली कमाई पर ही रोक लगा दे। ऐसा कोई नहीं चाहेगा। यही वजह है कि सारे नेता और सांसद एक सुर में जनलोकपाल बिल का विरोध कर रहे हैं। सरकार ये क्यों नहीं बताती कि उसके लोकपाल बिल में ऐसे कौन से प्रावधान हैं जो भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसेंगे। सरकार ये क्यों नहीं साफ करती कि जनलोकपाल बिल में क्या कमियां हैं? भ्रष्टाचार के खिलाफ कैसे एक सशक्त लोकपाल बिल लाया जा सकता है? लेकिन सरकार का उद्देश्य भ्रष्टाचार मिटाना नहीं है बल्कि अपने भ्रष्ट मंत्रियों को बचाना है। सांसदो को अपना करप्शन छिपाना है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों का सरकार दमन कर रही है। फिलहाल 17 अगस्त को संसद में हुई बहस ने ये तो साफ कर दिया है कि चाहे सांसद हो या फिर मंत्री सभी इस कल्पना में जी रहे हैं कि चुने जाने के बाद वो जनता से ऊपर हो गए हैं। वो जनता की नहीं सुनेंगे बल्कि जनता उनकी सुनेगी। अफसोस इस बात का हुै कि प्रधानमंत्री ने संसद में बयान तो दे दिया लेकिन जनता को बेवकूफ बना दिया। उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को गंभीरता से लेना चाहिए था और जनता की मांग को ध्यान में रखते हुए सशक्त लोकपाल बिल के बारे में चर्चा करनी चाहिए थी तो वे सरकार के बचाव में ही लगे रहे। फिलहाल हालात का जायजा लेने पर सरकार को यही सलाह है कि सरकार के मंत्री और सांसद जनता की सुने न कि अपने ईगो की। बहुत महत्वपूर्ण लड़ाई चल रही है सरकार को चाहिए कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए वो इस आंदोलन का समर्थन करे और भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक बेहतर रास्ता तैयार करे।
(भ्रष्टाचार विरोधी भारत का नागरिक)
अन्ना आएगा भ्रष्टाचार मिटाएगा
सरकार झुक गई, लेकिन अन्ना झुकने को तैयार नहीं । आखिर क्यों झुके अन्ना? उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी है, उसे अंजाम तक पहुंचाए बिना कैसे वो मुंह मोड़ सकते हैं? सशक्त लोकपाल की उन्होंने मांग की है। इस मांग को कैसे वो छोड़ सकते हैं? सरकार उन्हें जेल से रिहा करने को तैयार है, मगर वो जेल से बाहर नहीं निकलना चाहते। अन्ना का ये कदम हर देशभक्त का सर गर्व से ऊंचा करता है। अन्ना देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। हालांकि कुछ लोग उनके आंदोलन को ब्लैकमेलिंग करार दे रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि ऐसा ही होता रहा तो हर कोई ऐसे ही आंदोलन करता रहेगा और सरकार उनकी मांगें मानती रहेगी। ऐसे में व्यवस्था तो पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी। इस आशंका को कई लोग जायज मान रहे हैं। उदाहरण के तौर पर संभव है कल कोई समुदाय आरक्षण को लेकर आमरण अनशन पर बैठ जाए तो क्या सरकार इसी तरह से ब्लैकमेल होती रहेगी। ये सवाल जायज है मगर इस सवाल के अंदर ही जवाब भी छिपा है। अन्ना के आंदोलन से जो हालात पैदा हुए हैं उसकी जिम्मेदार सरकार खुद है। सरकार अपना ईगो लेकर बैठी है कि वो लोकपाल पर अपना ही ड्राफ्ट संसद में पास करवाएगी। सरकार को ये नजर नहीं आया कि सिविल सोसायटी के ड्राफ्ट के पीछे जनता का कितना बड़ा समर्थन है। सरकार के मंत्री बार-बार डेमोक्रेसी की दुहाई दे रहे हैं। लेकिन क्या वे ये भूल गए हैं कि भारत की सरकार 'जनता की जनता के द्वारा और जनता के लिए' के सिद्धान्त पर आधारित है। ऐसे में आप जनता को कैसे इग्नोर कर सकते हैं। ये ठीक है आप चुनकर संसद में आए हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप जनता के सेवक नहीं है। फिलहाल सरकार के मंत्री जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं उसे देखकर लगता है कि वे जनता के सेवक नहीं बल्कि उसके मालिक हैं। वो राजा है और जनता उनकी प्रजा। सरकार के लोग यही पर बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। जनता जानती है कि उसकी ताकत क्या है? भारत की जनता ने काफी कुर्बानियां देकर अपने देश की आजादी को हासिल किया है ऐसे में वो अपने अधिकारों को लेकर सजग ही रहेगी। सरकार कानून-व्यवस्था के नाम पर जनता को बेवकूफ नहीं बना सकती। भारत में राजशाही नहीं है। सरकार को ये समझना चाहिए। सरकार नहीं समझ रही है कि ये उसकी बड़ी गलती है। जनता जानती है कि वो लोकशाही में सांस ले रही है। उसे ये भी पता है कि वो आजाद भारत में है और उसे अपने विचारों को व्यक्त करने की पूरी आजादी है। सिस्टम खराब हुआ है उसे सुधारने के लिए जनता सड़कों पर उतरी है। अब सरकार के लोग आत्ममंथन करे कि उन्होंने ऐसा क्या गलत किया है कि जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा है। हाल के ही हलचलों पर यदि नजर डाले तो कॉमनवेल्थ घोटाला, 2 जी घोटाला, आदर्श घोटाला जैसे कई घोटाले हैं जिन्होंने जनता में सीधे संदेश दिया है कि नेता और चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ और सिर्फ जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने के लिए ही राजनीति कर रहे हैं। नेताओं ने ऐसी कोई ईमानदार छवि नहीं बनाई है जिससे जनता के मन में नेताओं को लेकर कोई सम्मान की भावना जागे। यही वजह है कि अन्ना हजारे की छवि नेताओं की छवि पर भारी पड़ गई है और उन्हें हासिल हो गया है भारी जनसमर्थन। जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इससे निजात पाना चाहती है और ये बड़ी वजह है जो देश की जनता अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतर आई है।
(सशक्त लोकपाल बिल का समर्थक)
जनलोकपाल बिल: गांधीवादी अन्ना बनाम तानाशाही सरकार
संदीप सिंह. कांग्रेस की सरकार ने अन्ना हजारे को शांतिपूर्ण अनशन करने से रोक दिया। सरकार अपने इरादे में कामयाब हो गई। कांग्रेस की यूपीए सरकार ये मानकर चल रही है कि अन्ना का अनशन रोककर उसने बहुत बड़ी जंग जीत ली है। मगर वो ये भूल गई कि ये अन्ना का अनशन नहीं था। ये अनशन भारत की जनता का था, जो भ्रष्टाचार से त्रस्त है। दावे पर दावे किए जाते हैं कि मनमोहन सिंह बेहद ईमानदार प्रधानमंत्री है, यदि ऐसा है तो फिर प्रधानमंत्री अपनी ये ईमानदारी जनलोकपाल बिल को लेकर क्यों नहीं दिखाते। क्यों ये तेरा बिल ये मेरा बिल का खेल रहे हैं। मुद्दा है देश में एक सशक्त लोकपाल जैसी संस्था को स्थापित करना ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लग सके। इसके साथ ये भी सच्चाई है कि यदि लोकपाल पर सरकारी ठप्पा लगा तो वो भी 100 में 99 के अनुपात से भ्रष्ट निकलेगा। तो यदि अन्ना के बिल पर ही भरोसा किया जाए तो इसका मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि अन्ना के बिल से निकला लोकपाल 100 या 99 या फिर 60-65 फीसदी ईमानदार होगा। सस्ते में ये कहा जा सकता है कि उस तथाकथित लोकपाल को भी ए राजा और कलमाडी जैसे नेताओं की तरह मोटी कमाई करने का मौका मिल जाएगा। अब बड़ा सवाल ये है कि आखिर भ्रष्टाचार की बीमारी से जनता कैसे मुक्ति पाए। जनता जानती है अन्ना की कोशिश ईमानदार है मगर ये वो लोकशाही सिस्टम है जहां किसी भी सुधार के लिए चुनाव लड़ना पड़ता है, क्या अन्ना चुनाव लड़ेंगे? यदि वो वाकई सिस्टम में सुधार चाहते हैं .....वाकई वो चाहते हैं कि जनता को असली आजादी मिले। तो फिर उनके पास चुनाव लड़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। कम से कम कांग्रेस नीत सरकार या उसके मुखिया मनमोहन सिंह तो यही कहना चाहते हैं। चाहे वो हों या फिर उनके मंत्रीगण उन्हें इस बात का घमंड है कि वो पांच सालों के लिए चुनकर आए हैं और उनके पास पर्याप्त बहुमत है। 2014 तक वो आराम से दिल्ली की गद्दी पर राज कर सकते हैं, ऐसे में एक अदने से अन्ना से क्या डरना। जनता को अन्ना ने प्रभावित कर भी लिया तो सरकार का क्या बिगाड़ लेंगे। अभी भले ही आंदोलन उफान पर हो लेकिन 2014 आते-आते लोकपाल को लेकर ये जोश और जुनून ठंडा पड़ जाएगा और जिस तरीके से जनता ने दोबारा कांग्रेस नीत सरकार को चुना है ठीक उसी तरह से तीसरी बार भी यही जनता कांग्रेस को सत्ता की कुर्सी पर काबिज करेगी। अब जहां इतना आत्मविश्वास हो तो फिर क्यों कांग्रेस पार्टी अन्ना से डरेगी। कांग्रेस जानती है कि उसकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। यही वजह है कि बाबा रामदेव की सभा को आधी रात को तोड़-फोड़ दिया गया। सरकार की ज्यादतियों की अति थी कि बाबा को भी जान बचाकर भागना पड़ा। अन्ना समाजसेवी है वो कोई नेता नहीं है जो चुनाव लड़ेंगे। वे बाकी नेताओं की तरह सत्ता हासिल करने के लिए समाजसेवा नहीं कर रहे। यदि ऐसा वो करते हैं तो फिर उनकी भी पोल जनता के सामने खुल जाएगी। लेकिन जनता को भरोसा है कि वो बापू के सच्चे अनुयायी है वो जैसे दिख रहे हैं असल में वैसे ही हैं। 16 अगस्त का दिन महत्वपूर्ण है। एक तरफ अन्ना का गांधीवादी चेहरा है तो दूसरी ओर कांग्रेस का वो भयानक चेहरा है जिसे देखकर ये यकीन कर पाना मुश्किल है कि ये वहीं कांग्रेस दल है जिसने अहिंसा का मार्ग अपनाकर देश को आजाद करवाया था। हाल के दिनों में कांग्रेस ने अन्ना के साथ जो किया है उससे उसकी बेहद गंदी छवि बनी है। अन्ना का दमन करके कांग्रेस जो पहचान बना रही है वो देश के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है। सभी जानते हैं कि अन्ना हजारे गांधीवादी हैं और गांधीवादी का दमन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान है। ये देशद्रोह से जरा भी कम नहीं है। क्या इस अपमान की सजा सरकार को मिलेगी। गांधीवादियों का दमन करने वाली ये सरकार क्या देशभक्त है। बहुत बड़ा सवाल है सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोकशाही के नाम पर नेहरु का राज परिवार भारत की सत्ता पर कब्जा जमाए बैठा है। सरकार द्वारा बार-बार डेमोक्रेसी का हवाला दिया जा रहा है। क्या यही डेमोक्रेसी है? अन्ना के दमन को देखकर ऐसा लग रहा है कि सरकार राजशाही की है। जो जनता की भावनाओं और उम्मीदों को कुचलती रहती है। जिसे जनता के सरोकारों से कोई मतलब नहीं रहता। अन्ना और सरकार के बीच विवाद सिर्फ इसी बात को लेकर है कि एक सशक्त लोकपाल होना चाहिए। सरकार अपने लोकपाल पर अ़ड़ी है और अन्ना अपने जनलोकपाल पर। अनुभव बताता है कि सरकारी लोकपाल जनता को बेवकूफ बनाने के लिए है। यदि अन्ना का जनलोकपाल बिल कानून बन गया तो फिर बेचारे नेताओं की काली कमाई बंद हो जाएगी। राजा और कलमाडी की तरह कई नेता और मंत्री जेल की सलाखों के पीछे होंगे। ऐसे में कौन ऐसा राजनेता या सांसद-मंत्री होगा जो अपने लिए कुआं खोदेगा। जाहिर है यही वजह है कि अन्ना का सरकार पुरजोर विरोध कर रही है। अन्ना को दबाया जा रहा है ताकि उनका जनलोकपाल बिल दब जाए और सरकार राहत की सांस ले। अन्ना के आंदोलन पर गेंद अब सरकार के पाले में है। लोकपाल बिल को लेकर अब तक जो भी तमाशा हुआ है उसे भूलकर देश के नागरिकों को सरकार से ये आग्रह करना चाहिए है कि सरकार जनता का ख्याल करे और खुद के लोकपाल और अन्ना के जनलोकपाल बिल के अच्छे प्रावधानों को मिलाकर एक नए बिल का मसौदा तैयार करे। ऐसा करने से एक सशक्त लोकपाल का निर्माण होगा और इस देश से भ्रष्टाचार का सफाया होगा। उम्मीद है सरकार इस दिशा में गंभीरता से सोचेगी। धारा 144 लगाना और गिरफ्तारी करना किसी समस्या का समाधान नहीं है याद रखिए कितनी बार अंग्रेजों ने राष्ट्रपिता गांधी को गिरफ्तार किया था। नतीजा क्या निकला हिन्दुस्तान आजाद हो गया। सरकार इस मु्द्दे पर जरा गंभीर हो जाए क्योंकि सरकार का यदि यही रवैया रहा तो फिर देश को भ्रष्टाचार से आजादी मिलने से कोई नहीं रोक सकता। ये गांधीवाद की ताकत है और इसके आगे सरकार बौनी है। फिलहाल बेहतर यही होगा कि सरकार कुछ ऐसा करे जिससे भ्रष्टाचार को मिटाने का क्रेडिट उसे मिले। यदि ऐसा होता है तो इसकी सबसे ज्यादा खुशी भारत की जनता को होगी।
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